The following poem by Avinash Tiwari from New Delhi won the second prize of Thirty Thousand Rupees in Wingword Poetry Prize 2026.
“काफ़ी अकेला हूँ मैं भी,”
पिताजी ने कभी नहीं बोले ये शब्द।
ज़िंदा भी थे तो हमारे लिए,
अपने लिए नहीं था वक़्त।
चुपचाप अपनी ज़िंदगी तोड़ कर जोड़ते रहे हमारी माँ,
“नाम रोशन करना बेटा ताकि सब कहें उसका बेटा अविनाश तिवारी है।”
धीरे-धीरे घड़ी बढ़ती रही,
विनाश हुआ शरीर का।
फिर एक दिन आया,
जहाँ हमारी ज़िंदगी का डॉक्टर,
अब एक अनंत मरीज़ था।
कभी न कभी मृत्यु आई मेरे पापा के लिए,
तभी कहा उन्होंने, “रुको, कुछ आख़िरी पल,
बस मेरे और मेरे बेटे के लिए।”
मोती जैसे आँसू रोया बेटा,
और तड़पता रहा सुनने को उनकी आवाज़ एक आख़िरी बार।
तभी आवाज़ निकली और पिता ने बोला,
“काफ़ी अकेला तो था मैं,
पर अकेला ही काफ़ी था।”