मुट्ठी में मिट्टी

The following poem by Dr Usha Rao from Bangalore, Karnataka won Ten Thousand Rupees in Wingword Poetry Competition 2026.

पुल की मुंडेर पर पानी की ओर टांगे लटकाए बैठा करते थे उन दिनों 

जब गांव ,घर,खेत,खलिहान सब अपना और अपना सब का माना जाता था


मुट्ठी में मिट्टी लेकर देखा करते थे उसमें रेंगने वाले जंतुओं को घंटों तक

मानो किसी प्रयोगशाला में बैठ

 जीवाणुओं पर  कर रहे हों अध्ययन 


सुबह, दोपहर औ सांझ 

जीवन के उमंग से उत्साहित हम 

जेबों में भर लिया करते थे विश्वास की मूंगफली 


उस मुट्ठी की मिट्टी में चींटी हो या केंचुआ 

कौतूहल था केवल जानना उसका जीवन 

बिना आहत किये


जब कि आज कत्लेआम बेहिचक हो जाता है..


सांवला झुटपटा गहराने लगा था 

हमारी चिंता थी मिट्टी के 

बसेरे को जस का तस रखने की!


 चिंताओं के बेपरवाह समय में

बालमन का आक्रांत अंतर्मन 

ठिठक सा गया ...


मिट्टी की तहस-नहस जिंदगी की 

तहस नहस है...

चिंता करना जोखिम  ..


यह किसी हादसे से कम नही  ,

सोचा हमने 


अंदर लावा ऊपर बर्फ को सहेजे 

 दम साधकर हमने

मुट्ठी की मिट्टी को अनाहत रख दिया भूमि पर!


प्रेम के अस्फुट स्वरों को सुना था हमने उस दिन ! 

संवेदनाओं का भोंथरापन

प्रेम में दुर्गन्ध भरने की कोशिश 

करते हैं...

घृणा से जूझते समय में 

संवेदना दशांश भी हो तो 

बचा रहता है प्रेम !