न भाषा न आशा

The following poem by Sanghamitra Debsharma from New Delhi, India won Ten Thousand Rupees in Wingword Poetry Competition 2026.

मानव का जीवन यह, चक्रव्यूह का घेरा। 

जीवन की आवश्यकता, ये संबंधों का फेरा ।

ये ज़ख्म, ये घाव, तिल - तिल रहा है बढ़, 

सामने भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन।

मन का ज़ोर सच की चाह,

यही काम आएगी,ना आएगी सिर्फ भाषा।। 


"कर्म पर अधिकार है फल पर नहीं ", 

गीता का कथन शिरोधार्य है। 

पर फिर भी-

फल ही तो कर्म का अंतिम लक्ष्य है। 

लक्ष्य बिना कर्म कैसा? लक्ष्य बिना जीवन जैसा। 


फल की आशा कर्म की प्रेरणा है। 

कर्म परिपूर्णता की प्रत्याशा है,

पर गीता का कथन तो सत्य है।


फल की आशा ही कर्म की राह है, 

हार जाने पर, निराशा की राह न धरे। 

कर्म तो अनिवार्य है, जीवन का अभिन्न अंग है, 

जीवन को चलाने वाला, 

लक्ष्य स्थल पर पहुँंचाने वाला, 

कर्म में निराश हो तो? 

मन का संयम, निरंतर प्रयास, 

यही काम आएगी, न आएगी सिर्फ आशा।